Home साहित्य भारत में भी भारतीय भोजन का अभाव

भारत में भी भारतीय भोजन का अभाव

SHARE

हृदयनारायण दीक्षित

भूख स्वाभाविक इच्छा है। यह हमारी योजना का परिणाम नहीं है। भोजन बिना शरीर नहीं चलता। सो प्रकृति ने हम सबके शरीर में ‘भूख’ नाम की इच्छा ग्रंथि जोड़ी है। पीछे सप्ताह कोहरे की एक रात में मैं अपने सहायक दल के साथ उत्तर प्रदेश में प्रवास पर था। सड़क के किनारे ढाबे की खोज में था। स्थानीय पुलिस ने मुझे एक सुंदर होटल तक पहुंचाया। ठेठ ग्रामीण क्षेत्र में भी मैनेजर ने अंग्रेजी टाइप बातें की। उसने अंग्रेजी टाइप भाषा में खाद्य पदार्थो के नाम बताए।

मेरा भाषा ज्ञान दगा दे रहा था। टमाटर को पानी में उबाल कर मसाला मिलाकर बने रस को ‘टोमैटो सूप’ कहना उचित है। पर इसके गाढ़ेपन का राज क्या? मन में प्रश्न उठे कि इसमें कुछ मिलाया तो नहीं गया? उसने पिज्जा फिज्जा जैसी अनेक चीजों का प्रस्ताव किया।

यह सर्दी में भी गर्मी का अहसास था। गांव देहात में भी इटली, इंग्लैंड और अमेरिका की अनुभूति थी। पिज्जा के बारे में सुना है कि यह भोजन से बचे अवशेषों को गरीबों को खिलाने के लिए एक ब्रेड पर रखा गया उच्छिष्ट होता था। मन खिन्न लेकिन भूख जीती। ऐसे ऊटपटांग खाद्य पदार्थो का बिल दिल धड़काने वाला था। दुख हुआ। भारत में भी भारतीय भोजन का अभाव था।

‘आहार’ व्यक्तित्व का आधार है। आहार का चयन प्राय: हमारा निर्णय होता है। लेकिन अस्तित्व के अन्य घटकों की तरह आहार पर भी देशकाल का प्रभाव होता है। ठंडी जलवायु वाले देशों में शरीर के ताप को विशेष स्तर पर बनाए रखने की जरूरत होती है। ऐसे देशों में अधिक ऊष्मा देने वाले आहार का चलन होता है। प्राचीन भारत में आहार की दृष्टि से व्यापक चिंतन हुआ है। अन्न ही काया का निर्माता है, इसी से ऊर्जा है, इसी से प्राण और जीवन भी। डॉ. सत्यकेतु ने ‘प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग’ (सरस्वती सदन दिल्ली, पृष्ठ 211-12) में वैदिक समाज के खानपान का विवेचन किया है।

लिखते हैं, “वैदिक युग में आर्यो के मुख्य भोज्य पदार्थ अन्न, कन्द, मूल, फल, दूध और धृत थे। प्रधानतया ब्रीहि, यव, तिल माश-उड़द, सरसों और गन्ने का उल्लेख मिलता है जिन्हें कृषि द्वारा उत्पन्न किया जाता है। तंदुल का उल्लेख भी वैदिक साहित्य में है जो चावल है। उबाले गए तण्दुलों को ‘ओदन’ कहते थे।”

उन्होंने ऋग्वेद (8.77.10) के हवाले ‘क्षीरपाकमोदनम’-दूध में पकाए चावल का भी उल्लेख किया है। छान्दोग्य उपनिषद् में आहार को मुक्तिदाता कहा है। कहते हैं कि आहार शुद्धि से सत्व-सिद्धि होती है। सत्व सिद्धि से सुंदर स्मृति मिलती है। स्मृति से तत्व ज्ञान मिलता है और तत्वज्ञान से मुक्ति मिलती है।

भोजन की गुणवत्ता के साथ भोजन शैली पर भी विचार जरूरी है। प्राचीन काल में भोजन की संख्या पर भी विचार हुआ था। शतपथ ब्राह्मण व तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार तब भोजन दो बार किया जाता था। ऋग्वैदिक काल में बैठकर भोजन की परंपरा थी। ऋग्वेद में भोजन की स्तुति भी की गई है। ब्रह्म पुराण के अनुसार हाथी, घोड़ा, गाड़ी, मंदिर, बिस्तर पर भोजन नहीं करना चाहिए।

सामूहिक भोजन के शिष्टाचार भी प्राचीन साहित्य में हैं। जैसे पंक्ति में प्रथम स्थान पर आग्रह के बाद ही बैठना चाहिए। सबके साथ ही उठना चाहिए। भविष्य पुराण में निषिद्ध भोजन के उल्लेख हैं। लहसुन, प्यास आदि को ‘स्वभावदुष्ट’ बताकर मना किया गया है। गंदे हाथों से परोसा गया, कुत्तों आदि से छुआ गया भोजन किया दुष्ट कहा गया है। बासी, दरुगध युक्त भोजन या बच्चा देने के 10 दिन के भीतर का गोदूध ‘कालदुष्ट’ कहा गया है।

भोजन की दृष्टि से शरीर, मन, बुद्धि और प्रज्ञा के निर्माण में अन्न की भूमिका है। तैत्तिरीय उपनिषद् की ‘भृगुवल्ली’ में वरुण द्वारा पुत्र भृगु को दिया गया उपदेश है। भृगु ने पिता वरुण से ब्रह्म की जिज्ञासा की। वरुण ने कहा, “अन्न, प्राण, नेत्र, कान, मन और वाणी ब्रह्म प्राप्ति के द्वार हैं।” भृगु ने निश्चय किया “अन्न ब्रह्म है – अन्नं ब्रह्ममेति व्यजानत। प्राणी अन्न से बढ़ते हैं। मृत्यु के बाद अन्न क्षेत्र पृथ्वी में समा जाते हैं।” अन्न महत्वपूर्ण है।

भौतिकवादी उपनिषद् साहित्य को अंधआस्थावादी, भाववादी बताते हैं। यहां अन्न भौतिक पदार्थ है, ऋषि अनुभूति में ब्रह्म है। बहुत प्रीतिकर मंत्र में कहते हैं “यह व्रत संकल्प है कि अन्न की निन्दा न करें – अन्नं न निन्द्यात। अन्न ही प्राण है। प्राण ही अन्न है। यह शरीर भी अन्न है। शरीर और प्राण का अंतर्सम्बंध है। अन्न ही अन्न में प्रतिष्ठित है। जो यह जान लेता है, वह महान हो जाता है – महान्भवति, महानकीत्र्या। (7वां अनुवाक)

फिर बताते हैं यह व्रत है कि अन्न का अपमान न करें – अन्नं न परिचक्षीत, तद् व्रतम्। जल अन्न है। जल में तेज है, तेज जल में प्रतिष्ठित है, अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है। जो यह जानते हैं वे महान होते हैं, कीर्तिवान होते हैं।” (8वां अनुवाक) फिर कहते हैं “यह व्रत है कि खूब अन्न पैदा करें – अन्नं बहुकुर्वीत। पृथ्वी अन्न है, आकाश अन्नाद है। आकाश में पृथ्वी है, पृथ्वी में आकाश है। जो यह बात जानते हैं वे अन्नवान हैं, महान बनते हैं।” (9वां अनुवाक)

अन्न भोजन है। इस उपनिषद् का अंतिम मंत्र बड़ा प्यारा है “यह व्रत है कि घर आए अतिथि की अवहेलना न करें। तमाम रीति से अन्न का प्रबंध करें। अतिथि से श्रद्धापूर्वक कहें – अन्न तैयार है। इस कार्य को ठीक से करने वाले के घर अन्न रहता है, मध्यम तरह से करने वाले के घर मध्यम और साधारण रीति से इस कार्य करने वाले के घर साधारण अन्न भंडार ही रहता है।” (10वां अनुवाक) यहां आहार का अर्थ अन्न है। उत्तरवैदिक काल का खूबसूरत ग्रन्थ है प्रश्नोपनिषद्। यहां (1.14) अन्न को प्रजापति ब्रह्म बताया गया है – अन्नं वै प्रजापति।

ऐतरेय उत्तरवैदिक काल के प्रमुख ऋषि थे। उनके रचे ऐतरेय उपनिषद् में कहते हैं, ह्लसृष्टि रचना के पूर्व ‘वह’ अकेला था, दूसरा कोई नहीं था। उसने सृजन की इच्छा की – स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति। उसने लोक रचे। उसने लोकपाल रचे। फिर इच्छा की कि अब लोक और लोकपालों के लिए अन्न सृजन करना चाहिए। उसने अन्न बनाए। (खण्ड 2 से खण्ड 3 तक) योगसूत्र बहुत बाद में रचे गए। उपनिषदों में शरीर अन्नमय कोष है। योग सूत्रों में भी शरीर को अन्नमय कोष कहा गया। भारत में अतिप्राचीन काल से अन्न ही प्रमुख भोजन रहा है।

चरक संहिता में आहार को जीवों का प्राण कहा गया है – “वह अन्न-प्राण मन को शक्ति देता है, शरीर की सम्पूर्ण धातुओं व बल वर्ण और इन्द्रियों को प्रसन्नता देता है।” आहार शुद्धि का ध्यान रखा जाना चाहिए। बताते हैं “भोजन से उदर पर दबाव न पड़े, हृदय की गति पर अवरोध न हो, उदर में क्रूरता न हो, इन्द्रियां (भी) तृप्त रहें।”

गीता में सत्व, रज और तम के अनुसार भोजन को तीन प्रकार का बताया गया, लेकिन चरक की स्थापना है “सत्व, रज और तम के प्रभाव में मन तीन तरह का दिखाई पड़ता है परन्तु वह एक है।” मन बड़ा कारक है। मनोनुकूल स्थान पर भोजन करने के अतिरिक्त लाभ हैं, “मन-अनुकूल स्थान पर भोजन से मानसिक विकार नहीं होते। मन के अनुकूल स्थान और मनोनुकूल भोजन स्वास्थ्यवर्धक हैं।” (वही 559)

आधुनिक काल में भोजन सम्बंधी समूचा प्राचीन ज्ञान ही खारिज कर दिया गया है। फास्ट फूड का जमाना है। मांसाहार के नये तरीके आए हैं। शराब की खपत बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि नए-नए रोग बढ़े हैं। तनाव बढ़े हैं। क्रोध बढ़ा है, क्रोधी बढ़े हैं।

हम भारतवासी छोटे नकलची हैं। हम दूसरे देशों की वैज्ञानिक शोध, अध्ययन और ज्ञान विज्ञान की नकल नहीं करते। ज्ञान विज्ञान में हम दुनिया से प्रेरित नहीं होते लेकिन उनके भोजन, हैप्पी क्रिसमस या हैप्पी न्यू इयर का पट्टा बांधे आधुनिक हो जाने की गलतफहमी में हैं। हमारी इन्हीं कमजोरियों का लाभ बाजार के घाघ उठाते हैं और हम ठगे जाते हैं। अंग्रेजी टाइप बातें सुनकर। आधुनिक होना ही है तो पढ़ाई लिखाई को अद्यतन बनाना चाहिए और संस्कारों को पुननर्वा शक्ति देनी चाहिए। (आईएएनएस/आईपीएन)

( लेखक उ.प्र. विधानसभा के अध्यक्ष हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। )

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here