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इस्लाम में क्या जायज़ है तीन तलाक

अल्लाह के नज़दीक सबसे नापसंदीदा अलफ़ाज़ तलाक है। फिर ये शब्द ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दीगर मुस्लिम संगठनों को क्यों इतना पसंदीदा हो गया कि वो इसकी प्रासांगिकता पर अपना एकाधिकार समझने लगे हैं।

 

अल्लाह के नज़दीक सबसे नापसंदीदा अलफ़ाज़ तलाक है। फिर ये शब्द ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दीगर मुस्लिम संगठनों को क्यों इतना पसंदीदा हो गया कि वो इसकी प्रासांगिकता पर अपना एकाधिकार समझने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक की सुनवाई के दौरान वो इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा करना तो दूर, मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी तरह के सुधार के नाम पर भी बिदक रहे हैं और इसे सीधे बोर्ड एवं शरई मामलों में दखलअंदाजी करार दे रहे हैं। होना तो ये चाहिए था कि इस मामले पर केंद्र सरकार के हस्तक्षेप और कोर्ट में जाने से काफी पहले ही कुरान व हदीस की रौशनी में एक साथ तीन तलाक दिए जाने जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बोर्ड स्वतः संज्ञान लेता और दूसरे देशों की तरह ही भारत में भी मुस्लिम महिलाओं को उनका मूल हक दिए जाने का मार्ग प्रशस्त करता।

इस्लाम धर्म जीवनशैली का नाम है

इस्लाम धर्म तो वैसे ही एक पूर्ण जीवनशैली का नाम है। ये पूरी इंसानियत को अपनी तालीम के अनुसार जिंदगी बसर करने का पूरा मार्गदर्शन करता है। इसके बावजूद तीन-तलाक़ जैसे मुद्दे हमेशा से ही बहस के मौजू क्यों बने रहे ये बात अपने आप में विचार तलब है। क़ाबिले-ज़िक्र है कि इस्लामी ख़ानदान की इब्तेदा निकाह से होती है जिसमें बंध जाने के बाद मर्द और औरत, ज़िंदगी भर के लिए एक दूसरे के साथी बन जाते हैं। ऐसे में भला इतने पवित्र बंधन को इस्लाम एक झटके में तोड़ने की इजाज़त देता है, ऐसा कहना शायद अनुचित होगा। अलबत्ता अगर ये रिश्ता एक दूसरे के लिए राहत की बजाए मुसीबत बन जाए तो ऐसी सूरत में तलाक़ की इजाज़त है। यानी निकाह और तलाक़ ख़ानदान की स्थापना और बिखराव के दो पहलू हैं।

अलग होने के लिए तलाक की सहूलत

इससे स्पष्ट हो जाता है कि जब किसी जोड़े का साथ-साथ रहना असंभव लगने लगे तो उसे अलग होने के लिए तलाक की सहूलत दी गई है, ऐसे में इसे लत बना लेना गलत है। इसके लिए कुरान और हदीस में कई जगह बाकायदा एक प्रक्रिया बताई गई है। इसके अनुसार तीन तलाक के बीच में एक निर्धारित मुद्दत तय की गई है। एक बार तलाक कहने के बाद दूसरे के बीच में महिला की इद्दत और तहुर के पूरा होने का समय दिया जाना चाहिए। दोनों का मतलब शादीशुदा महिला के अगले मासिक धर्म या उसके बाद की पवित्रता से है। चूंकि ये समय लगभग एक माह के अंतराल का होता है, इसलिए तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के लिए कई जगह 90 दिनों की मोहलत का जिक्र है। इस दौरान तलाक के फैसले पर पुनर्विचार करने और समझौता करने की पूरी गुंजाइश रखी गई है। इस दौरान मर्द और औरत को एक ही छत के नीचे रहने तक की छूट दी गई है। हां एक बार तीन तलाक पूरा हो जाने पर मियां-बीवी अगर फिर से साथ रहना चाहें तो निकाहे-हलाला आवश्यक हो जाता है। इसके अनुसार महिला को किसी दूसरे पुरूष से निकाह करने के बाद तलाक लेना और फिर से अपने पहले शौहर से निकाह पढ़वाना लाजिम हो जाता है।

भारत में एक तबका तीन तलाक के खिलाफ है

रही बात एक साथ तीन तलाक देने की तो इसके पीछे दलील दी जाती है कि ये पैगम्बर मोहम्मद के जमाने से प्रचलित है। मुस्लिम उलेमा का कहना है कि चारों इमाम- इमाम अबू हनीफा, इमाम हम्बल, इमाम शाफई और इमाम मालिक भी एक साथ तीन तलाक देने पर एकमत हैं। गौरलतब है कि दुनिया के अधिकतर सुन्नी मुसलमान इन्हीं चारों इमामों की पैरवी करते हैं। हालांकि कहा जाता है कि बाद में इमाम हम्बल का इस मामले में मत भिन्न हो गया था और उन्होंने तीन तलाक के दरम्यान निर्धारित समय का पालन करने की हिदायत दी। 13वीं और 14वीं सदी के मशहूर इस्लामी स्कॉलर इमाम तैमिय्याह ने इसका धुर विरोध किया और इसे तालाके-बिद्दत तक कह डाला। अर्थात तलाक का ऐसा तरीका जो गलत है और इंसानों की ईजाद है। खुद भारत में ऐसे उलेमा और मुस्लिम बुद्धजीवियों की एक बड़ी तादाद है जो तलाक के इस तरीके से या तो सहमत नहीं हैं या फिर कुछ कहने से बचते हैं।

बहरहाल एक साथ तीन तलाक को सही ठहराने वाले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दूसरे मुस्लिम संगठनों की दलीलों को अगर मान भी लिया जाए तो उनसे ये सवाल किया जाना जरूरी है कि क्या तलाक का यही तरीका सबसे उचित है? अगर नहीं तो फिर वो हमारे हमसाया मुल्क पाकिस्तान और बंग्लादेश समेत सऊदी अरब, ईरान, सीरिया, सूडान, इंडोनेशिया, मिश्र और तुर्की जैसे दुनिया के कई इस्लामिक देशों की तरह इसपर प्रतिबंध लगाने की वकालत क्यों नहीं करते?

शरई ऐतबार तीन तलाक जायज़ है

कई इस्लामिक धर्म गुरूओं और बुद्धजीवियों की मानें तो एक साथ तीन तलाक शरई ऐतबार से बेशक जायज़ है लेकिन इसके पीछे वो तर्कसंगत परिस्थितियों को जिम्मेदार मानते हैं। जैसे कि अगर कोई औरत खुली बेहयाई कर रही है या फिर दूसरे ऐसे हालात उत्पन्न हो जाएं कि दोनों का साथ-साथ रहना नामुम्किन हो जाए। ऐसे हालात में एक साथ तीन तलाक दिए जाने का प्रावधान रखा गया है। स्वयं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का भी कहना है कि तलाक की लंबी प्रक्रिया और उसके खर्च से बचने के लिए कोई शौहर अपनी बीवी का कत्ल जैसा अपराधिक कदम उठा सकता है। ऐसे में जाहिर है कि उसकी ये दलीलें भी एक साथ तीन तलाक को विशेष परिस्थितियों में ही सही ठहराती हैं। अजीब बात है कि खास हालात में दी गई इस छूट को भारतीय मुसलमानों ने तलाक का यही एक एकमात्र तरीका मान लिया और हमारे यहां एक साथ तीन तलाक का तरीका ही सबसे अधिक प्रचलित हो गया। हद तो यह है कि अब इसके लिए स्पीड पोस्ट, स्काइप, व्हाट्सएप और दूसरी आधुनिक तकनीक तक का इस्तेमाल किया जाने लगा है।

चंद माह पूर्व सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में एक ऐसा ही मामला आया। इसमें उत्तराखंड की रहने वाली एक महिला शायरा बानो ने एक साथ तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह को असंवैधानिक करार देने की गुहार लगाई थी। उसके पति ने महज एक खत के जरिए तीन बार तलाक लिखकर रिश्ता तोड़ दिया था। इसके बाद तो ऐसे मामलों की एक झड़ी सी लग गई है और आए-दिन ही कोई न कोई नया मामला सामने आ जाता है। ऐसे में क्या इसे महिला अधिकारों पर कुठाराघात नहीं कहा जाएगा?

दरअसल जिस तरह इस्लाम धर्म ने एक साथ तीन तलाक की छूट देते हुए उसपर विशेष परिस्थितियों को लाजिम करार दिया है, उसी तरह हमारा संविधान भी अगर हमें अपने धर्म और आस्था को मानने का मौलिक अधिकार देता है तो उसपर लैंगिक समानता का भी हक देता है। अफसोस की बात ये है कि पुरूष प्रधान समाज और सोच के चलते मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक साथ तीन तलाक को जायज तो ठहरा देता है लेकिन महिला अधिकारों की कहीं न कहीं अनदेखी करता है। मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते अब तक विगत सरकारें इस मामले पर अपना स्पष्ट पक्ष रखने से बचती रही हैं। अब इस मामले पर पहली बार केंद्र सरकार मुस्लिम महिलाओं के हक में खुलकर सामने आई है। बोर्ड को भी चाहिए कि वो इसपर अपना रुख स्पष्ट करे और उसमें मुस्लिम पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं के निहितार्थ को भी ध्यान में रखे।