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जब दिनकर ने कुंवर जी से कहा,  तुमने अभी ‘आत्मजयी’ लिख डाली है तो बुढ़ापे में क्या लिखोगे!

जब दिनकर ने कुंवर जी से कहा,  तुमने अभी ‘आत्मजयी’ लिख डाली है तो बुढ़ापे में क्या लिखोगे!

Rajpath Desk : साहित्य में कुंवर नारायण को भूलना शायद ही कोई पसंद करेगा। उनके लिखे पंक्तियां फिर कभी कागज हुआ तो चेष्‍टा करूंगा, जिंदगी किसी ऐसे पत्र का इंतजार हो….ये शायद जीवन की इससे बड़ी और सुखद कल्‍पना नहीं हो सकती कि यह किसी पत्र के इंतजार की तरह हो जिसे लिखने वाला प्रेम से लिखे।

कुंवर नारायण हिंदी के उन चुनिंदा कवियों में अग्रगण्‍य हैं जिन्‍हें विश्‍व की सर्वाधिक भाषाओं में अनूदित किया गया है जो विदेश के अनेक विश्‍वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाते हैं और भारत में सर्वश्रेष्‍ठ पुरस्‍कार भारतीय ज्ञानपीठ सहित अनेक सम्‍मानों से नवाजे जा चुके हैं।

कुंवर जी पिछले एक साल पहले तक बहुत सक्रिय रहे हैं। धीरे-धीरे आंखें कमजोर हुईं पर सुबह अपनी स्‍टडी में बैठने की आदत उनकी वैसी ही रही। कहते हैं कि जब वे लखनऊ में रहते थे तो उनका एक बड़ा सा पुस्‍तकालय था जहां देश दुनिया की बेहतरीन साहित्‍यिक किताबों और पत्रिकाओं का संग्रह नजर आता था। यह ऐसा ठीहा था जहां टाइम्‍स लिटरेरी सप्‍लीमेंट की फाइलें व्‍यवस्‍थित रुप में देखी जा सकती थीं।

हालांकि रोशनी खो कर भी वे बातचीत करते रहे हैं कभी पत्नी भारती जी की सहायता से, कभी मिलने वाले के सहयोग से। फिर ऐसे भी क्षण आए कि वे उसे छूकर देखते। बातों से समझते-समझाते-और अब जब वह प्रकाशनाधीन है, वे उसके आने की राह ही देखते रहे और अचानक उन्हें अस्पताल जाना पड़ा। 15 नवंबर 2017 को उनकी मृत्यु हो गई।

एक जमाना था वे एक दिन में तीन-चार फिल्‍में देखते थे। अनेक फिल्‍म फेस्‍टिवल्‍स में उनकी मौजूदगी रही है। अभी हाल ही में लेखक का सिनेमा नामक पुस्‍तक आई है जिसमें उनकी गंभीर फिल्‍म समीक्षाएं पढ़ी जा सकती हैं। कविताएं लिखने के अलावा विदेशी कविताएं पढ़ने और उन्‍हें हिंदी में अनुवाद करने का गहरा शौक रहा है। ऐसी कविताओं की भी उनकी एक किताब न सीमाएं न दूरियॉं हाल ही में प्रकाशित हुई है।

कुंवर नारायण को पहाड़ी स्‍थलों पर घूमने का बहुत शौक रहा है। ऐसी ही एक जगह रामगढ़ में जिस बंगले में कुंवर नारायण ठहरे थे, यहां कभी रवींद्रनाथ ठाकुर ने गीतांजलि की कुछ कविताएं लिखी थीं। यह बंगला उनके एक अंग्रेज मित्र का था। रामगढ़ पर कुंवर नारायण की भी एक कविता है।

कुंवर जी ने ‘आत्मजयी’ लिख कर राष्‍ट्रकवि दिनकर को चौंका दिया था। उनसे मिलने आए दिनकर ने युवा कुंवर को देखकर पूछा था: ‘तुम्हीं कुंवर नारायण हो?’ फिर ‘जी’ सुनने के बाद संशय में डूबते-उतराते हुए दिनकर ने कहा था: ‘ये बताओ जब तुमने अभी ‘आत्मजयी’ लिख डाली है तो बुढ़ापे में क्या लिखोगे!’

एक ऐसा ही वाकया हजारीप्रसाद द्विवेदी से मुलाकात का है। कुंवर नारायण ने उनकी किसी पुस्तक की एक पत्रिका में समीक्षा करते हुए उसकी काफी धज्जियां उड़ाई थीं। इसलिए जब किसी आयोजन में हजारीप्रसाद द्विवेदी को देखा तो उनसे बचने लगे, पर पंडित जी ने उनकी झिझक भांप ली और स्वयं मिलने आए तथा कहा कि ‘बहुत अच्छा लिखा है तुमने।

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