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किशोरी नीहा ने बुनी आकाशगंगा के अंदर की कहानी

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नई दिल्ली| वह शून्य से जुड़कर समय के पार चली गई और परिणाम ‘कुछ और’ सामने आया। 15 साल की नीहा गुप्ता की लिखी पहली किताब में निकोल ग्रेस की कहानी है, जिसे उसके पिता जब उसका ग्रह विनाश के कगार पर होता है, तब उसे धरती पर भेजते हैं, जो उस ग्रह यानी ब्रिजन की एकमात्र जीवित सदस्य है, जो पड़ोसी आकाशगंगा एंड्रमेडा में एक ग्रह है।

जैसा कि वह खुद को धरती पर रहने के अनुकूल ढालने की मशक्कत करती है और अपने स्कूल और ग्रह के लिए अपना योगदान देने की कोशिश करती है, यह एक बेहद होशियार लड़की की चार से 14 साल की यादगार तस्वीरों के साथ की कहानी है।

निकोल के दोस्त अमांडा, सारा और आयुष उसे एक अनाधिकृत क्षेत्र की यात्रा करने में मदद करते हैं और इस प्रक्रिया में वे अपने स्कूल को संकट से बचाते हैं और दुनिया को अंतरिक्ष यात्रा का एक नया तरीका भी देते हैं।

मुंबई के जमनाबाई नरसी इंटरनेशनल स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा द्वारा लिखी किताब की बिक्री से हुई आमदनी को अनुदान के रूप में दिए जाने को भले ही मुट्ठी भर कहें, लेकिन वह नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के चिल्ड्रन फाउंडेशन को अनुदान देती है, ताकि देश के भविष्य बच्चों का जीवन संवर सके।

नीहा का मानना है कि किशोर साधारण नहीं होते, जैसा कि उन्हें समझा जाता है। जरूरत पड़ने पर वे खुद को साबित करने में पीछे नहीं हटते। वे चुनौतियां भी पसंद करते हैं और क्या सही व क्या गलत है, इस चीज को ध्यान में रखते हैं।

नीहा ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में बताया, “शुरुआत में यह मन में कहानी की एक रूपरेखा तैयार करने जैसा था, तो जब भी कोई विचार आया, मैं लिख लेती। बाद में मुझे जब भी समय मिलता, मैं उन विचारों को विस्तार देती। लेकिन किताब लिखने के अंतिम चरणों में, जिसे पूरा करना सबसे मुश्किल होता है, मैंने हर दिन एक शब्द सीमा तक पहुंचना सुनिश्चित किया। वास्तव में, अनुशासन की वजह से मुझे किताब पूरी करने में मदद मिली।”

यह पूछे जाने पर कि इस पुस्तक का कैसे आना हुआ? नीहा ने कहा, “मैं हमेशा से पढ़ने की शौकीन रही हूं और पढ़ने के प्रति मेरा प्यार लिखने की इच्छा के रूप में बदल गया। सातवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान मैंने ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया और जैसे मैं बड़ी होती गई, मुझे अहसास हुआ कि मैं उस कहानी के साथ बड़ी हुई हूं। फिर मैंने सोचा कि किताब को वास्तव में बस एक बड़े ब्लॉग की तरह होना चाहिए, तो नौवीं कक्षा में गर्मियों की छुट्टियों के दौरान मेरे जेहन में एक विचार आया कि कैसे दूसरे ग्रह की रहने वाली लड़की खुद को हाईस्कूल में पढ़ने वाली छात्रा के रूप में ढालेगी, मैं इससे बेहद रोमांचित हो गई। मैंने इस कहानी को पूरा करने का मन बना लिया और लिखना शुरू कर दिया।”

नीहा के इस प्रयास को उनकी स्कूल की प्रमुख जैस्मीन मधानी ने भी सराहा।

मधानी ने प्रस्तावना में लिखा कि किताब का शीर्षक लगभग बिल्कुल सही है, क्योंकि ‘डिफरेंट’ (अलग हटकर) एक ऐसा शब्द है, जिसे कोई लेखिका के बारे में बताने के लिए इस्तेमाल में ला सकता है। नीहा ने जब से स्कूल में प्रवेश लिया है, तब से ‘ईमानदार’, ‘कर्तव्यनिष्ठ’ और ‘मेहनती’ जैसे शब्द उसके रिपोर्ट कार्ड का हिस्सा रहे हैं। उन्हें निशानेबाजी में दिलचस्पी है। नीहा समय बर्बाद नहीं करती।

यह पूछे जाने पर कि क्या वह एक और किताब लिख रही है, नीहा ने कहा, “वास्तव में अभी तक एक और किताब लिखने के बारे में नहीं सोचा है, लेकिन जब मैं शशि थरूर से मिली, उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे जरूर लिखते रहना चाहिए, इसलिए अगर समय और विचार सही मालूम पड़ेगा, तो निश्चित रूप से मैं इस चुनौती को स्वीकार करूंगी।”

उन्होंेने कहा, “फिलहाल, मैं अपनी 10वीं बोर्ड की परीक्षा पर ध्यान दे रही हूं। किसी दिन, मैं भारत के लिए पिस्टल शूटिंग (निशानेबाजी) में ओलंपिक पदक जीतने की ख्वाहिश रखती हूं।”

इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रीय राजधानी के दौरे पर आईं नीहा ने कैलाश सत्यार्थी से मुलाकात की और अपने इस अनुभव को बहुत अच्छा बताया।

उन्होंने कहा, “सत्यार्थी से मिलकर बहुत अच्छा लगा। मैं ज्यादातर चुप रही और उन्हें इस बात का अहसास हो गया, जिस पर उन्होंने कहा कि तुम्हें और बोलना चाहिए। सच्चाई यह है कि मैं 10 करोड़ बच्चों के जरिए 10 करोड़ के अभियान के लिए कैलाश सत्यार्थी के चिल्ड्रन (बाल) फाउंडेशन की ब्रांड एंबेसडर बनकर बेहद सम्मानित महसूस कर रही हूं। अपनी किताब की बिक्री से योगदान देने के अलावा मैं अपनी किताब के जरिए जहां भी पहुंच सकती हूं, युवाओं को संगठित करने की उम्मीद करती हूं।”

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि नोबेल पुरस्कार विजेता और कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन नीहा को ‘बदलाव लाने वाली युवा’ कहते हैं।

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