आध्यात्मिक सशक्तिकरण से ही मीडिया में विश्वसनीयता, नैतिकता और जिम्मेदारी का उन्नयन संभव : विशेषज्ञ
आध्यात्मिक सशक्तिकरण से ही मीडिया में विश्वसनीयता, नैतिकता और जिम्मेदारी का उन्नयन संभव : विशेषज्ञ
आबू रोड। राष्ट्रीय मीडिया कॉन्फ्रेंस-2026 के अंतर्गत 11 सितंबर को मानसरोवर, आबू रोड में आयोजित प्लेनरी सेशन-2 “आध्यात्मिक सशक्तिकरण द्वारा मीडिया मानकों का उन्नयन” विषय पर पत्रकारिता में नैतिकता, सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता, फेक न्यूज, सोशल मीडिया, एआई जनरेटेड कंटेंट और आध्यात्मिक सशक्तिकरण को लेकर गहन मंथन हुआ। वक्ताओं ने कहा कि मीडिया केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का सशक्त माध्यम है। पत्रकारिता की वास्तविक शक्ति उसकी विश्वसनीयता, सत्य और निर्भयता में है। इसके लिए पत्रकारों को तकनीकी दक्षता के साथ अपने मन और विवेक को भी सशक्त बनाना होगा।
समापन से पहले सभी वक्ताओं ने सोशल मीडिया और एआई के दौर में पत्रकारिता के सामने चुनौतियां, आध्यात्मिक जागरूकता, सत्यनिष्ठा, आत्मअनुशासन और मानवीय संवेदनाओं का जिक्र किया। वक्ताओं का कहना था कि इन चुनौतियों का समाधान ध्यान और आध्यात्म से संभव है। पत्रकार यदि अपने मन को शांत और विवेक को जागृत रखकर कार्य करें तो मीडिया समाज में सकारात्मक परिवर्तन, शांति और श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. कुंजन आचार्य, हेड, जेएमसी, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर ने कहा कि ब्रह्माकुमारीज में आकर नैतिकता और शांति का पाठ सीखने का अवसर मिलता है। वर्तमान समय में मीडिया व्यावसायिक दबाव, व्यूअरशिप और एल्गोरिदम की प्रतिस्पर्धा से तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि धर्म और आध्यात्मिकता अलग-अलग हैं तथा आध्यात्मिकता व्यक्ति को जागरूक बनाने का कार्य करती है। मन को जागरूक और अनुशासित करने से व्यक्ति अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं खोज सकता है। पत्रकारों के लिए आध्यात्मिक अनुशासन मन को शक्ति देता है। उन्होंने कहा, “जो सत्य है वही समाचार है, लेकिन जो समाचार है वह जरूरी नहीं कि सत्य हो।” किसी खबर को वायरल करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना आवश्यक है। हर वायरल खबर सत्य नहीं होती। पत्रकार समाज में सूचनाओं के पहरेदार हैं, इसलिए उन पर बड़ी जिम्मेदारी है।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए
गुरुग्राम से आये वरिष्ठ पत्रकार डॉ. डी.डी. मित्तल ने कहा कि आध्यात्मिक सशक्तिकरण का अर्थ अपने कार्य को करते हुए भीतर से सशक्त और जागरूक रहना है। पत्रकारिता में समाचार के स्रोत की गोपनीयता बनाए रखना आवश्यक है तथा खबर के स्रोत को किसी खतरे में नहीं डालना चाहिए। उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ देश की संप्रभुता और सुरक्षा का ध्यान रखने पर जोर दिया। फेक न्यूज को वर्तमान समय की बड़ी चुनौती बताते हुए उन्होंने क्रेडिबिलिटी और अकाउंटेबिलिटी पर ध्यान देने की बात कही। एआई जनरेटेड कंटेंट के संदर्भ में उन्होंने कहा कि तकनीक पर भरोसा किया जा सकता है, लेकिन आंख मूंदकर नहीं। पत्रकार को तकनीक के साथ अपने विवेक का भी प्रयोग करना चाहिए।
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के रजिस्ट्रार डॉ. ओमवीर सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में मीडिया और आध्यात्म के बीच दूरी दिखाई देती है, जिसे आत्मचिंतन, करुणा और मानवीय मूल्यों के माध्यम से कम किया जा सकता है। पत्रकारिता में सवाल पूछना अधिकार है, लेकिन सवाल पूछते समय भाषा, उद्देश्य और संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी जरूरी है। उन्होंने महात्मा गांधी के पत्रकारिता संबंधी आदर्शों का उल्लेख करते हुए कहा कि मीडिया सेवा है, केवल व्यापार नहीं। सत्य सबसे बड़ा मानक और निर्भयता पत्रकार की शक्ति है। मीडिया का काम डरना नहीं, बल्कि स्वयं जागना और समाज को जगाना है। उन्होंने ब्रह्मा बाबा के संदेश “दृष्टि से सृष्टि बनती है” का उल्लेख किया।
सत्र के दौरान ब्रह्माकुमारीज शांतिवन से वरिष्ठ राजयोग प्रशिक्षिका डॉ. बीके सुनीता बहन ने सभी प्रतिभागियों को राजयोग ध्यान की अनुभूति कराई। उन्होंने ध्यान के माध्यम से मन को शांत, स्थिर और सकारात्मक बनाने का अभ्यास कराया। जबकि मंच का कुशल संचालन जबलपुर से आई मीडिया एंड पीआर विंग की कोऑर्डिनेटर बीके विनीता ने किया।
भोपाल से आये असेम्बली ऑफ एमपी जर्नलिस्ट के प्रदेश अध्यक्ष राधाबल्लभ सारदा ने कहा कि पत्रकारिता में सबसे पहले विश्वास अर्जित करना चाहिए। समय की कीमत समझना और अपने अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों को जानना जरूरी है। पत्रकारिता हमेशा दूसरों के लिए जीने का माध्यम रही है। उन्होंने कहा कि दूसरों पर उंगली उठाने से पहले पत्रकार को स्वयं का मूल्यांकन करना चाहिए। पत्रकारिता के क्षेत्र में सत्य के लिए कठिनाइयों का सामना करने का साहस भी होना चाहिए।
जनमंत्रा डॉट कॉम, रायपुर के एडिटर-इन-चीफ विशाल यादव ने कहा कि खबर सबसे पहले पहुंचाने की होड़ के बजाय सही खबर सबसे पहले और विश्वसनीय तरीके से पहुंचाना पत्रकारिता का उद्देश्य होना चाहिए। पत्रकारिता में मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकार को खबर से पहले जरूरतमंद व्यक्ति की मदद के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने प्रेरक पंक्तियों के माध्यम से कहा, “अपने हर लब्ज का खुद में आईना हो जाऊंगा, उसको छोटा कहके मैं कैसे बड़ा हो जाऊंगा, मुझको रोका गया तो मैं काफिला हो जाऊंगा।”
माय जीओवी इंडिया, नोएडा के मैनेजर (कंटेंट एंड डिस्ट्रीब्यूशन) उदय चंद्र सिंह ने डिजिटल मीडिया की विश्वसनीयता पर चर्चा करते हुए कहा कि डिजिटल न्यूज रिपोर्ट 2026 के अनुसार केवल लगभग 39 प्रतिशत लोग मीडिया पर भरोसा करते हैं। यह आंकड़ा पत्रकारों के लिए आईने की तरह है। उन्होंने कहा कि ब्रह्माकुमारीज संस्थान सादगी, शांति और पवित्रता के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन का कार्य कर रहा है। पवित्रता धन के प्रति, सादगी जीवन के प्रति और शांति मन के प्रति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां समस्या है, वहां समाधान भी संभव है और जहां तनाव है, वहां शांति भी संभव है। ऐसे आयोजनों में नए पत्रकारों को जोड़ना भी आवश्यक है।
प्रसिद्ध लेखिका नीता जोशी, जयपुर ने कहा कि मीडिया को अपनी शक्ति का सही और बेहतर तरीके से उपयोग करना चाहिए। मुख्यधारा के मीडिया में कई बार छोटे और महत्वपूर्ण मुद्दे सामने नहीं आ पाते, लेकिन सोशल मीडिया ने ऐसे मुद्दों को व्यापक मंच दिया है। उन्होंने कहा कि मीडिया को अपनी शक्ति के साथ अपनी जिम्मेदारी को भी समझना होगा।
चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमित ने कहा कि सीखने की प्रक्रिया जीवनभर चलती रहती है और हम सभी निरंतर सीख रहे हैं। इस प्रकार के सेमिनार और कॉन्फ्रेंस पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होते हैं। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। पक्षपात से बचते हुए चयनित और संयमित शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में शांति प्राप्त करने के लिए समय निकालना चाहिए। दिन की अच्छी शुरुआत और बेहतर प्लानिंग से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
एसएवीपी शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इंदौर की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वंदना जोशी ने “आध्यात्मिक सशक्तिकरण एवं मीडिया मानकों का उन्नयन” विषय पर कहा कि आज हमें “पिक पत्रकारिता नहीं, पीस पत्रकारिता” की आवश्यकता है। मीडिया को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि पाठकों को क्या पसंद है, बल्कि ऐसी सकारात्मक सामग्री प्रस्तुत करनी चाहिए जिससे समाज में अच्छे विषयों के प्रति रुचि पैदा हो। उन्होंने कहा कि मीडिया को अपने मानक स्वयं निर्धारित करने होंगे। मनुष्य अपने कर्मों से ही देवतुल्य या नकारात्मक बनता है। इसलिए कलम का उपयोग समाज के हित और सकारात्मक परिवर्तन के लिए हो.
